ग़ज़ल–

फ़िराक़े -यार में अपनी यही कहानी है
तमाम उम्र ही सहरा की खाक छानी है

मेरे हुज़ूर की तशरीफ़ आज आनी है
इसी ख़बर से हुई दिल में शादमानी है

ये एक बात ही दिल में उतर गई मेरे
कि उसकी आँखों में शर्म-ओ-हया का पानी है

बढ़ा रही है मेरे दिल की बेक़रारी को
महक उड़ाती फ़िज़ाओं में रातरानी है

न पूछ मुझसे जुदाई के वाक्यात सनम
बग़ैर तेरे भी क्या कोई ज़िंदगानी है

सुनी गई न अदालत में बात भी मेरी
ये साफ़ साफ़ मेरे साथ बेइमानी है

बुलंदियों की तरफ़ जा रहा हूँ मैं साग़र
मुझे लकीर मुक़द्दर की आज़मानी है
🖋️विनय साग़र जायसवाल

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