मैं नदी हूं

चट्टानों से टकराती हूं।
उन्हें पीसती जाती हूं।।

बाधाओं से ना घबराती,
खुद अपनी राह बनाती हूं।।

कल कल छल छल करती,
मैं शोर बहुत मचाती हूं।।

कभी न थकती कहीं न रुकती,
निरंतर बहती जाती हूं।।

मेरे तट पर हैं तीरथ सारे,
सबके पाप ताप मिटाती हूं।।

बाँधों और नहरों से होकर,
खेतों की प्यास बुझाती हूं।।

परोपकार हित जीना सीखो,
सबको संदेश सुनाती हूं।।

चरैवेति चरैवेति चरैवेति,
सबक सबको दे जाती हूं।।

जो भी मिला बाँटते जाओ,
पाठ तुम्हें मैं पढ़ाती हूं।

प्रियतम सागर से मिलने,
सतत दौड़ती जाती हूं।।

तुमसे मिलकर ही ‘प्यारे,’
परम शांति मैं पाती हूं।।

प्यारेलाल साहू मरौद छत्तीसगढ़

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