*ए गाजीपुर ! तुम बहुत याद आते हो*

*ए गाजीपुर ! तुम बहुत याद आते हो*

ए गाजीपुर ! तुम बहुत याद आते हो बे। एक शौक पाल लिए थें बाहर का सपना देखने का लेकिन अब एहसास होता है कि बेटा उ सपना नहीं, ब्लंडर वाली गलती थी हमारी।
साला बचपन से लेकर 18 बरस की ज़िंदगी काटें हैं तुम्हारे साथ। उतना ही जितना अम्मा और बाउजी के साथ। फिर पढ़ाई और बाहरी दुनिया के शौक में छोड़ आएं तुमको।

पता है इहवाँ दोस्त यार बहुत हैं पर लँका और सिचाईं विभाग की तरह सड़क पर चाय पीते हुए गप्पे मारने का टाइम नहीं है इनके पास। चमचमाती सड़कों पर जब मुझसे तेज़ दौड़ती हुई लखटकिया दुपहिया निकलती है तो अनायास निकल जाता है कि बेटा कब्बो कासिमाबाद या रेवतीपुर वाली सड़क पर आओ तो दिखाते हैं बाप कौन।

इन्हवा प्यार मोहब्बत में भी मज़ा नहीं आता है क्योंकि इहवाँ का प्यार महंगा है बहुत। कहे के मतलब कि दोस्त की गाड़ी पर बैठकर गली के राउंड लगा लेने से लड़की खुश नहीं होती बल्कि किसी महंगे कैफ़े में अपॉइंटमेंट लेना पड़ता है न।

इहवाँ सड़क पर गिर जाओ त कउनो उठाने नहीं आता है जबकि तुम्हारे यहाँ तो ब्लेड लगने पर भी जिला अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में स्पिरिट लगवाने पहुंच जाते थें।

इहवाँ सब लोग ज़िंदगी को तेजी से गुज़ार रहे हैं पर सुकून तो तुम्हारे यहाँ ही है बे। खैर तुम अपना सुकून बनाये रखना। हम आएंगे वापस लेकिन डर लगता है कि कहीं फुल्लनपुर क्रासिंग से रेल गुजरते ही आंखे न भर जाए। पूरा शहर न दिखने लगता है वहाँ से।
बहुत कुछ बतियाना है बे तुमसे पर साला इहवाँ टाइम किसके पास है। चलो अब बस करते हैं। भूल मत जाना तुम शिवांश को। जल्दी फिर चिट्ठी लिखता हूं तुमको।

*शिवांश त्रिपाठी ( गाजीपुर )*

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