लघुकथा

ताड़ की परेशानी

लघुकथा

ताड़ की परेशानी

रोज सुबह लोगों को अपनी तरफ आते देख ताड़ का वृक्ष सोचता था कि ये लोग मुझे लेने आ रहे हैं और अकड़ कर खड़ा हो जाता था- इतनी आसानी से थोड़े हाथ आने वाला हूँ।
लेकिन जब वह अपने आस-पास जमीन पर फैले दूब को तोड़ते देखता था तो हैरान हो जाता था-
ये लोग भी न अजीब हैं। फल की छोड़कर व्यर्थ के मामूली घास को तोड़कर अपने घर ले जाते हैं।
रोज- रोज का यही सिलसिला देख वह एक दिन दूब से पूछ ही बैठा।
” दूब! ये मुर्ख लोग तुम जैसे मामूली घास को ले जाकर क्या करते हैं? इन्हें फल खाने की इच्छा नहीं होती है और जो धूल-धुसरित है उसे तोड़कर घर ले जाते हैं।”
दूब ने बड़ी विनम्रता से जबाब दिया।
“भैया! आप तो इतने बड़े हो कि तुम्हें लोग आसानी से तोड़ भी नहीं सकते। सीधे तनकर खड़े हो। मैं तो जमीन पर हूँ।”
“लेकिन तुम किस काम की?”
” उनके किसी काम की नहीं हूँ, वो तो अपने अराध्य देव गणेश जी के लिए ले जाते हैं।”
ताड़ का वृक्ष सोचने लगा-
एक दिन बढ़ते-बढ़ते जब स्वर्ग में जाऊँगा तो गणेश जी से पूछूँगा कि आखिर दूब में ऐसा क्या है, जो तुम्हें अति प्रिय है?

पुष्पा पाण्डेय।

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