*एक देव दीपावली ऐसी भी*

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सुनो ! तुम्हे याद तो है न, हमारी पहली मुलाकात। जो इन घाट के सीढ़ियों से शुरू हुई थी और वो वादा जो अस्सी से मणिकर्णिका तक साथ निभाने का था। और मिलने का बहाना हमेशा वही होता था निम्बू वाली चाय पीने का जो कभी तुम्हे भी बहुत पसंद हुआ करती थी। याद है मुझे हर पूर्णिमा को तुम्हारा चाँद देख कर हमारा साथ मांग लिया करना पर आज तो कार्तिक पूर्णिमा है और देखो अब तक मांगी हुई तुम्हारी सारी मन्नतें खोखली निकल गईं। आज हम साथ नहीं हैं। ये जो दिए जलते हुए देख रही हो न ये तब ही हैं जब तक बाती का साथ है।
पर हम कभी दिया और बाती तो बन ही नहीं पाए और मुझे बनना भी नहीं था दिया और बाती जैसा। मुझे तो तुम्हारी ज़िंदगी का पूरा पूरा वो दीपक ही बनना था था जो तुम्हारे ज़िंदगी के अंधेरे को दूर करने के लिए खुद को जलाता रहे और बदले में क्या चाहिए था बस थोड़ा सा साथ। पता है न मैं शाश्वत हूँ और न तुम लेकिन ये रिश्ता जिसका जन्म इन घाटों पर हुआ न वो शाश्वत है क्योंकि उसके साक्षी महादेव हैं।
बैठा हूँ घाट पर अकेले दीपक लेकर और इंतज़ार है तुम्हारा इन तमाम वी आई पी लोगों के बीच में क्योंकि मेरी ज़िंदगी की वेरी इम्पोर्टेन्ट पर्सन तो सिर्फ तुम ही हो न। हो सके तो आ जाना वहीं जहां हम पहली बार मिले थें और आते हुए थोड़ा सा तेल लेते आना और साथ में दीपक जला कर उस जगह को रोशन करेंगे जहां से हमारा रिश्ता प्रारम्भ हुआ था और अगर नहीं आई तो आज फिर से दिये और खुद को जलाकर फिर से जुट जाऊंगा तुम्हारी ज़िंदगी में उजाला लाने की कोशिश में।

© *शिवांश त्रिपाठी( गाजीपुर)*

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