जीवन यात्रा

शीर्षक – जीवन यात्रा

जीवन की आपाधापी में सब पाकर कुछ खो जाता है
आओ रंग भरे उन यादों में फिर,जिनसे जीवन का नाता है

इक दूजे के जीवन में ,जब आये थे नई अंगड़ाई थी ,
प्रेम में वो तरुणाई थी, उगते सूरज सी अरुणाई थी,
प्रेम पगी हुई बातें थी, सोने से दिन थे कितने सुहाने
और चाँदी सी रातें थीं, नित नये गीत मन गाता है ।

जीवन की———————–

जैसे- जैसे जीवन बढ़ता है, प्रेम रूप धुंधलाता सा है
संघर्षों में ऐसे तपे हम , मध्यान्ह में जैसे सूरज तपता है
कर्तव्य गले लग जाते हैं , प्रेम दूर खड़ा मुस्काता है ।

जीवन की———————-

आओ प्रिय,अब करें प्रवेश हम ,जीवन के नये सोपानों में, न यौवन का आर्कषण है , न संघर्षों का घर्षण है
कर्तव्यों के मुक्तिबोध की, मन में अब निश्चिंता है।
जीवन की———————–

जीवन की सांझ में भी ,प्रिय,ढलते सूरज सी सुंदरता है
तेरे – मेरे प्रेम में अब , चांदनी सी शीतलता है
जो छूट गया कहीं वही करे अब,जो मन से हमकों भाता है।

जीवन की———————-

जीवन की तिजोरी में हमने, कितने ही पलों को सहेजा है
इसमें सब कुछ , इसमें सब है
तेरा- मेरा ये जीवन प्रिय , रंग भरा इक उत्सव है
जिसे सोंच-सोंच मन हर्षाता है ।

( स्वरचित)

मीनाक्षी शर्मा ‘पंकज’ नवी मुंबई महाराष्ट्र

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