हिंदी दिवस

हिंदी दिवस

आजादी के बाद से ही 1949 से हिंदी दिवस मनाया जा रहा है। भारत में हिंदी बोलने वालों की संख्या अधिक थी और है, लेकिन फिर भी स्वतंत्रता के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मानने के लिये लोग एकमत नहीं थे और हिंदी राजभाषा ही होकर रह गयी। गाँधी जी भी इसे जनमानस की भाषा मानते थे। वो भी राष्ट्रभाषा के पक्षधर थे। हिंदी साहित्य के विद्वानों ने भी इसको राष्ट्रीय भाषा का मान देने पर जोर दिया था। जैसे हजारी प्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविन्द दास आदि ने इसका जोरदार समर्थन किया था ,परन्तु कुछ विवादो के कारण यह राज भाषा ही बन कर रह गयी।

हिंदी का गौरवशाली इतिहास रहा है। इसकी लिपि देवनागरी है। देवनागरी लिपि में ही सभी भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत भी है। यह देवों की भाषा है। वेद, पुराण सभी देवनागरी लिपि में ही लिखे गये हैं। साहित्य जगत में हिंदी का एक महत्वपूर्ण स्थान है। हिंदी अपने अन्दर कई उपभाषाओं को समेटी हुई है, जिसे बोली भी कह सकते हैं। तुलसी ,सूर, जायसी, रसखान आदि सभी कवियों ने इसी लिपि में साहित्य की रचना कर हिंदी को समृद्ध बनाया।

देश का कोई भी कोना ऐसा नहीं होगा जहाँ दो-चार लोग हिंदी नहीं बोलते होंगे। भले ही आधिकारिक तौर पर हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है, लेकिन जनमानस के लिये यह राष्ट्रीय भाषा ही है। हिंदी आत्मा से सम्बंध रखती है।

यह बिड़म्बना ही है कि रोजगार के लिये हमें दूसरी भाषा का सहारा लेना पड़ता है और इसी रोजी-रोटी की खातिर लोग अंग्रेजी को अपनाते चले गये। अब धीरे-धीरे इस समस्या का भी समाधान निकल रहा है। दूसरी भाषा सीखना गलत नहीं है, लेकिन अपनी भाषा का मान-सम्मान बनाये रखना जरूरी है। हमें अपनी भाषा और अपनी धरती से जुड़े रहना, अपनी जड़ो से जुड़े रहना है। हिंदी हमारा आत्मसम्मान है। हमारी संस्कृति, नृत्य-कला, संगीत के सातों स्वर हिंदी का ही गुणगान करते हैं।

हिंदी दिवस या हिंदी पखवाड़ा मनाकर हम अपनी हिंदी को यह एहसास दिलाते हैं कि चाहे तुम राजभाषा हो या राष्ट्रभाषा, मेरे

लिये तो प्राणदायिनी हो।हर साँसों में बसी हो। भाषा के बगैर जीवन भी पशु समान है। अतः इसे प्राणदायिनी कहना गलत नहीं होगा। जननी न सही यशोदा तो है। हमारी परवरिश तो इसी यशोदा माँ के आँचल तले हुई है और आज भी हो रही है। हमारी आने वाली पीढ़ी चाहे जो भी भाषा सीखे, जो भी करे, लेकिन हिंदी से उनकी आत्मा को जोड़ने की जिम्मेवारी हमारी है। जैसे माता-पिता को मान-सम्मान, इज्जत देना सिखाते हैं वैसे ही हिंदी भाषा के लिये भी सीख देनी होगी।

पहले की अपेक्षा आज हिंदी के प्रचार-प्रसार या रोजगार के क्षेत्र में काफी विकास हुआ है और हो रहा है। यदि हम ये कहें कि फिल्मी दुनिया या टेलिविजन कार्यक्रमों का सहयोग आधिक रहा तो अनुचित नहीं होगा।

बहरहाल देर भले ही हो रही है, लेकिन हिन्दी को एक-न-एक दिन राष्ट्रभाषा तो बनना ही है।

पुष्पा पाण्डेय।

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